रायपुर (छत्तीसगढ़)। रिपोर्टर – मेघा तिवारी
राजधानी रायपुर में इंसानियत को शर्मसार कर देने वाली घटना सामने आई है। यशवंत अस्पताल में इलाज से अधिक महत्व पैसों को दिया गया और उसी पैसों के इंतज़ार में एक मासूम ज़िंदगी हमेशा के लिए बुझ गई।
नेहा छूरा का केस
जानकारी के अनुसार, नेहा छूरा नाम की युवती को 1 सितंबर को कमर दर्द की शिकायत के बाद यशवंत अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इलाज के दौरान परिवार ने पहले ही 3 लाख रुपये जमा करा दिए थे।
लेकिन जैसे ही मरीज की हालत गंभीर हुई और डॉक्टरों ने दूसरे अस्पताल रेफर करने की बात कही, तभी असली अमानवीय चेहरा सामने आया।
40 हजार रुपये बने ‘जिंदगी और मौत’ की कीमत
परिजनों के अनुसार, अस्पताल प्रबंधन ने साफ़ शब्दों में कह दिया कि –
“पहले 40 हजार रुपये दीजिए, तभी रेफर करेंगे।”
परिवार ने हाथ जोड़कर कहा कि वे रकम बाद में दे देंगे, लेकिन मरीज को तुरंत रेफर किया जाए। लेकिन प्रबंधन का दिल नहीं पसीजा और मदद की जगह केवल पैसों की मांग पर ज़ोर दिया गया।
जिंदगी की जंग हार गई नेहा
समय पर रेफर न किए जाने की वजह से नेहा की हालत और बिगड़ गई। देर होने के चलते युवती ने अस्पताल में ही दम तोड़ दिया।
परिजनों का आरोप है कि –
अगर अस्पताल प्रबंधन ने तुरंत सहयोग किया होता, तो उनकी बेटी की जान बच सकती थी।
डॉक्टर का ‘मौन’
इस पूरे मामले पर जब मीडिया ने डॉ. सिद्धार्थ साहू से संपर्क करने की कोशिश की, तो उन्होंने कॉल रिसीव करना भी उचित नहीं समझा। अस्पताल की यह चुप्पी कई सवाल खड़े करती है।
उठते बड़े सवाल
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क्या अब अस्पताल इलाज का मंदिर नहीं, बल्कि पैसों का बाज़ार बन चुके हैं?
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क्या इंसान की ज़िंदगी की कीमत सिर्फ पैसों से तय होगी?
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इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार कौन है?
जांच की मांग
फिलहाल, पीड़ित परिवार ने सीएमएचओ से मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। वहीं, स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसे अस्पतालों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए ताकि भविष्य में किसी और मासूम की जान पैसों के इंतजार में न जाए।
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